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दिवाली के दिन

26 Nov

याद है मुझे बचपन का वो दिवाली का इंतज़ार,

जब लाता था हर त्यौहार खुशियों की बहार ,

स्कूलों की हो जाती थी छुट्टी,

सब नयी खरीदी के लिए पट जाती थी मम्मी,

वो पूरे घर को दीया – बाती और मोमबत्ती से सजाना,

शाम ढ़लते ही दोस्तों संग पठाके छोड़ना,

याद है आज  भी पापा के साथ चौपड़ से लाया गन्ना,

हमारे मोहल्ले की दुकान पे मावे की मिठाइयों का सजना ।

 

दीपावली की सुबह उठ के रंगोली बनाना,

गेरू और चाक के मांडने से घर आँगन सजाना,

गेंदा फूल और अशोक के पत्तों को चौखट पे लगाना,

तब दादी बुनती थी रुई की बाती,

दादा बैठ के खेलते थे तीन पत्ती|

 

गोवर्धन पूजा पर मंदिर में प्रसादी का वो जीमण,

सबके घरों में मेहमानों का आगमन|

देखो फिर दिवाली है आई,

घरों में रौनक है लौट आई,

पर अब बदल गया माहौल, बदल गयी त्योंहार के नाम की मुस्कुराहट,

नहीं बदली तो बस जयपुर की दिवाली पे दुल्हन की तरह सजावट|

-इशिता गुप्ता